Google+ Badge

Wednesday, 29 November 2017

चन्दा अपनी चाँदनी से कह दो

चन्दा अपनी चाँदनी से कह दो चली जाये यहाँ से
अब मुझे ये काली रातें ही अच्छी लगतीं हैं
चाँदनी रात अब मुझे बैरी विरहन सी लगती है
चाँदनी रात में मेरे दिल के ज़ख्म भी दिखाई पड़ते हैं
काली रातों से मैंने दोस्ती जो कर ली
अब वही मुझे शीतल और निर्मल लगती है
चन्दा तुम्हारी ये चंदनियां बड़ा सताती है
अपनी रौशनी से मेरे ह्रदय को बड़ा जलती है
चन्दा अपनी चाँदनी से कह दो चली जाये यहाँ से


शीरीं मंसूरी “तस्कीन”

No comments:

Post a Comment